News@ हरिश राठौड़
पेटलावद।दशा माता पूजन को लेकर शहर और पुरे अंचल में महिलाओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। कोई तडक़े ही जाग गई तो किसी ने पूरी रात आंखों में काट दी। कहीं रात 12 बजे पतवारी पूज ली गई तो किसी ने सुबह तक यह मनोरथ किया। जहां-कहीं पीपल का पेड़ दिखा,जगह-जगह रखी पूजन सामग्री श्रद्धा को दर्शा रही थी। पीपल पर कूकड़ी लपेटने का क्रम अपरान्ह बाद तक चलता रहा। शहर के गणपति चोक में कथा और पीपल पूजन के बाद महिलाओं ने पीपल के वृक्ष के आगे घूमर भी रमी। इस दौरान महिलाओं की काफी भीड़ देखी गई। घरों में विशेष रूप से लपसी बनाने के साथ माता को धूप लगाया गया। इसी धूप के धुएं से निकाली वेळें (दस गांठ लगे सूत के पीले धागे) गले में धारण करने के बाद आहार किया।
दशामाता पूजन के लिए नगर के बड़ा रामजी मंदिर स्थित प्राचीन पीपली बाड़े में आस्था उमड़ी। यहां प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी विधि-विधान से हुई। यहां स्टेट के जमाने से यह पीपल पूजी जा रही है। आम धारणा है कि यह वृक्ष 200 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। यहां पूजा और व्रत की कथा का संचालन गामोठ परिवार वर्षो से करते आ रहे है। इस वर्ष भी वर्तमान गामोठ पंडित गौरव कोशिक द्वारा सुबह 4 बजे मां दशामाता को 10 तार की जनेऊ पहनाकर व्रत की शुरूआत की।
दशामाता के पर्व पर महिलाओं ने उपवास रखकर विधि विधान के साथ पूजा-र्अचना की। गणेश चौक, निलकंठेश्वर महादेव मंदिर, शनि मंदिर, मुक्तिधाम, बामनिया रोड माही कॉलोनी बड़ा रामदेव जी मंदिर सहित करीब एक दर्जन स्थानो पर स्थित पीपल के वृक्ष पर महिलाओं का पहुंचना सुबह से ही शुरू हो गया था। महिलाओं ने पूजा के साथ परिक्रमा कर वृक्ष पर आस्था की सूत से बनी डोर बांध परिवार में सुख-समृद्धि की मंगल कामना की। कथा सुनने के पश्चात महिलाओं ने अपने-अपने घरो के दरवाजो के दोनो तरफ हल्दी कुमकुम के छापे लगाकर पूजा का जल घर में छिडक़ा। पीपल के वृक्ष की पूजा करने का वैज्ञानिक एवं पर्यावरण सरंक्षण का महत्व है। सभी वृक्षों में पीपल का वृक्ष सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि एकमात्र पीपल का ही पेड़ ऐसा है जो रात के समय अन्य वृक्षों की तरह कॉर्बन डाई ऑक्साईड नहीं छोडते हुए ऑक्सीजन ही छोड़ता है। पंडितो के अनुसार पीपल में सभी देवों का वास मानकर पीपल के वृक्ष को देवतुल्य रूप मानकर पूजा अर्चना की जाती है।


