अधिकारियों की मिलीभगत फल-फूल रही हैं झोला छाप उर्फ बंगाली डॉक्टरों की दुकानें....

 



News@हरिश राठौड़

पेटलावद -- नगर सहित पेटलावद  क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का फायदा उठाकर बिना किसी वैध डिग्री, लाइसेंस या योग्यता के झोला छाप डॉक्टरों की भरमार है। इनमें कई बंगाली मूल के कथित चिकित्सक शामिल हैं, जो सस्ते इलाज, इंजेक्शन और दवाओं के नाम पर गरीब आदिवासी आबादी को लूट रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि ये अवैध क्लीनिक जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत या संरक्षण में खुलेआम चल रहे हैं। पेटलावद और आसपास के गांवों में ये फर्जी डॉक्टर क्लीनिक चलाते हैं, जहां वे एलोपैथी दवाएं, एंटीबायोटिक्स और यहां तक कि गंभीर बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं। बिना एमबीबीएस या किसी मान्यता प्राप्त डिग्री के ये लोग इंजेक्शन लगाते हैं, छोटे-मोटे ऑपरेशन करने की कोशिश करते हैं और गर्भवती महिलाओं, बच्चों व बुजुर्गों का इलाज करते हैं। कई मामलों में लापरवाही से मरीजों की मौत भी हो चुकी है, लेकिन कार्रवाई नाममात्र की ही होती है।

स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य विभाग की टीम कभी-कभी छापा मारती है और 1-2 क्लीनिक बंद करती है, लेकिन कुछ दिनों बाद ये दुकानें फिर से खुल जाती हैं। कारण? ऊपरी संरक्षण।स्वास्थ्य अधिकारी या राजनीतिक प्रभावशाली लोग इन झोला छाप डॉक्टरों को चुपके से सपोर्ट करते हैं, क्योंकि इनसे मोटी रिश्वत या अन्य फायदे मिलते हैं। गरीब लोग असली डॉक्टरों और सरकारी अस्पतालों की दूरी तथा महंगे इलाज से तंग आकर इनके पास जाते हैं।


खतरा कितना बड़ा है?


जान का खतरा: गलत इंजेक्शन, एक्सपायरी दवाएं या अनुचित इलाज से कुछ मौतें भी हो चुकी हैं।


आर्थिक शोषण: 


सस्ते इलाज का लालच देकर ये लोग मरीजों से ज्यादा पैसे वसूलते हैं और दवाएं भी महंगी बेचते हैं।


क्या होना चाहिए?


स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को तुरंत बड़े स्तर पर छापेमारी अभियान चलाना चाहिए।

सभी अवैध क्लीनिक बंद कर फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ FIR दर्ज की जाए और उन्हें जेल भेजा जाए।

जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो, जो इनका संरक्षण कर रहे हैं।

क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत किया जाए ताकि लोगों को सही इलाज मिल सके।

यह मुद्दा सिर्फ पेटलावद तक सीमित नहीं है – पूरे मध्य प्रदेश और देशभर में झोला छाप डॉक्टरों का नेटवर्क सक्रिय है, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत इसे और खतरनाक बना रही है। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो गरीबों की जानें लगातार खतरे में रहेंगी।

स्थानीय मीडिया, सामाजिक संगठनों और आम जनता को इस मुद्दे को उठाना चाहिए। 

सतर्क रहें, सही इलाज चुनें – झोला छाप नहीं, योग्य डॉक्टर ही भरोसेमंद।



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