पेटलावद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट
पर्युषण अलौकिक पर्व है। व्यक्ति सुखेच्छु होता है।
सुख प्राप्ति के लिए वह कृत समर्पण बना रहता है। सुख प्राप्ति के लिए संकल्प करता है ,प्रयास करता है और प्रत्युत कई बार पुनः दुख के आवर्त्त में फंस जाता है। स्थायी या निरपेक्ष सुख की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है अध्यात्म। उसकी आराधना सदैव की जाना चाहिए। पर उसकी सघन साधना सबके लिए सदा संभव नहीं बनती ,इसलिए कुछ दिनों को धर्म आराधना के लिए विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। श्वेतांबर जैन परंपरा में पर्युषण को पूरे वर्ष में विशेष धर्म आराधना के अवसर के रूप में गौरव प्राप्त है। उसमें भी सर्वाधिक महत्व और मूर्धन्य स्थान संवत्सरी महापर्व के दिन को प्राप्त है। उक्त आशय के उदगार श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ के 11वें अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी के विद्वान शिष्य मुनि श्री वर्धमान कुमारजी ने पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन तेरापंथ भवन में समुपस्थित श्रावक -श्राविकाओं के समक्ष व्यक्त किए। आपने कहा पर्यूषण का शाब्दिक अर्थ है- "परि" चारों ओर से सिमटकर ,"वसन" एक स्थान पर निवास करना या स्वयं में वास करना।
मनुष्य अनंत जन्म बिता देता है औरों को देखने में किंतु वह नहीं जानता कि उसके अपने भीतर क्या है? छिलके को देखने वाला बाहरी रंग आकार से परिचित हो सकता है।
पर भीतर के रंग रूप से नहीं।
पर्युषण पर्व भीतर मुड़कर देखने की बात कहता है। जिन्होंने भीतर देखा वह तर गए। पर्यूषण पर्व नहीं किन्तु महापर्व है। यह भाद्रव मास में सामान्य त्योहारों की तरह आता है इसलिए पर्व है किंतु यह पर्व पूर्ण आत्म शुद्धि का प्रेरक है, उत्प्रेरक है। इसलिए यह महापर्व है ।
*हारा हाची बू* ।
पर्युषण का पहला दिन खाद्य संयम दिवस के रूप में निर्धारित है । साधना के लिए देह आवश्यक होती है। भोजन देह को टिकाने के लिए आवश्यक होता है। इस प्रकार आहार शरीर का और शरीर साधना का एक आधार है। आदमी को खाद्य का संयम और विवेक रखना चाहिए। भोजन रूपी वेतन देकर शरीर रूपी सहचर से साधना, सेवा और स्वाध्याय रूपी कार्य करवाना चाहिए।
कुछ लोग और अखाद्य और अपेय द्वारा अपना पेट भरते हैं ।
इस संदर्भ में मुनिश्री ने जैन रामायण का प्रसंग सुनाया राजा
सोदास के बारे में बताया।
जितनी भूख उससे कम खाना चाहिए। 50% अन्न के लिए ,25 %पानी के लिए ,25%वायु के लिए। अगर यह केलक्यूलेशन खराब होती है तो शारीरिक कठिनाई आती है। जापान में हारा हाची बू की परंपरा है ।भोजन के पहले हारा हाची बू बोला जाता है।इसके माध्यम से कम खाने की प्रेरणा दी जाती है।
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के शब्दों में स्वाद के लिए खाना अज्ञान, जीने के लिए खाना आवश्यकता और संयम की रक्षा के लिए खाना साधना है।
*संघ शिरोमणि जयगणी*
आज तेरापंथ धर्म संघ के चौथे आचार्य श्रीमद जयाचार्य का 141वां महाप्रयाण दिवस है ।
मुनिश्री ने उनके जीवन और साधना के बारे में बतलाया। भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के अंतर्गत भगवान महावीर का पहला भव नयसार के बारे में बताया ।27 भवो का वर्णन ही क्यों मिलता है ?यह भी बताया।
मुनि श्री राहुल कुमारजी ने
उत्तराध्ययन आगम का वाचन किया तथा जैन धर्म की प्राचीनता, कालचक्र यौगलिक युग के बारे में बताया।
*बड़ी संख्या से
उपवास ग्रहण*
~आज पर्युषण के प्रथम दिन बड़ी संख्या में श्रावक -श्राविकाओं ने मुनि श्री से उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।
