पेटलावद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट
जो प्रिय और कांत भोगो के उपलब्ध होने पर भी उनकी ओर पीठ फेर लेता है वह त्यागी होता है।कंचन (धन) और कामिनी (स्त्री) का त्याग करने वाला ही साधु होता है।उक्त आशय के उदगार श्री जैन श्वेताम्बर तेरापन्थ धर्मसंघ के 11 वे अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के विद्वान सुशिष्य मुनि श्री वर्धमानकुमारजी ने तेरापन्थ भवन में श्रावक -श्राविकाओं के समक्ष व्यक्त किए।आपने कहा कि त्याग का संसार मे बड़ा महत्त्व होता है।मुनि जीवन मे तपस्या के अनेक प्रसंग बनते रहते है।मनपसन्द वस्तु का त्याग करना बड़ी बात होती है।पतंगा दीपक का प्रकाश पाने की लालसा में जल जाता है।आपने प्रसंगवश कहा कि संसार मे जन्मदिन पर खुशियां मनाई जाती है।।जबकि जन्मदिन आने पर जीवन का एक वर्ष कम हो जाता है।ज्ञान ,तप-जप की गंगा निरन्तर प्रवर्धमान~ मुनि श्री की प्रेरणा से अनेक श्रावक -श्राविकाओ की तप आराधना निरन्तर गतिमान है।ऐसे व्यक्ति भी तपस्या कर रहे है जिन्होंने उपवास से ऊपर तप ही नही किया है।
एक बालिका ने मुनि श्री से 11 उपवास का प्रत्याख्यान किया।साथ ही मुनि श्री द्वारा आवश्यक ज्ञान कंठस्थ करने की प्रेरणा भी निरन्तर प्रदान की जा रही है।प्रतिदिन सायंकालीन गुरु वन्दना पश्चात छोटे बच्चों के धार्मिक ज्ञान विकास के लिए ज्ञानशाला भी निरन्तर लग रही है।आज मुनि श्री वर्धमानकुमारजी की संसार पक्षीय माताजी श्रीमती राज श्री जैन (हैदराबाद -सूरत) ने अपने विचार व्यक्त किए।इस अवसर पर श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा की ओर से श्रीमती राजश्री जैन का साहित्य आदि भेटकर सम्मान किया गया।कार्यक्रम तेरापंथी सभा के मंत्री श्री लोकेश भंडारी ने किया।
