जैन संस्कार विधि से दीपावली पूजन कार्यशाला का हुआ आयोजन....

 



पेटलावद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट


अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के निर्देशन में तेरापंथ युवक परिषद पेटलावद द्वारा आचार्य श्री महाश्रमणजी के शिष्य मुनि श्री वर्धमान कुमारजी आदि ठाणा-2  के सान्निध्य में जैन संस्कार विधि से दीपावली पूजन कार्यशाला का आयोजन दिनाँक 1 नवंबर 2021 को तेरापंथ भवन पेटलावद पर किया गया।


कार्यशाला का प्रारंभ मुनि श्री वर्धमान कुमारजी द्वारा जय महावीर भगवान के गीत के संगान के साथ किया।  मुनि श्री ने श्रावक श्राविकाओं को उद्बोधन मैं बताया की हमारी मान्यता के अनुसार दीपावली पर्व का संबंध भगवान महावीर स्वामी से है। इस दिन भगवान महावीर स्वामी ने निर्वाण को प्राप्त किया था।


अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के निर्देशन में जो पूजन विधि तैयार हुई है उसमें कई मंत्रों का समावेश है। सर्वप्रथम नमस्कार महामंत्र की बात आती है, जिसका नाम ही महामंत्र है और जैन धर्म का मुख्य मंत्र है, जिसमे अरिहंतों, सिध्दों, आचार्यो, उपाध्यायों व सर्वसाधु को नमस्कार किया जाता है। अरिहंत शब्द में अर्हतो को नमस्कार किया जाता है, जो 4 घनघाती कर्मो का क्षय कर केवलज्ञानी बन चुके हैं। अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत चारित्र, अनंत शक्ति से सुशोभित होते हैं। यह वीतरागी बन चुके हैं। अरिहंतो का वर्णन प्रथम पद्य में आता है, क्योंकि अरिहंत प्रवचनकार होते हैं और यदि वे प्रवचन नहीं करेंगे तो कैसा पता चलेगा की सिद्ध कौन है। तीर्थंकर गलत प्रवचन नहीं देते क्योंकि वे राग द्वेष से मुक्त हैं।  द्वितीय पद्य में सिद्धो का वर्णन आता है जो आठो कर्मों का क्षय करके मोक्ष पधार गए हैं।  सिद्ध जन्म मरण से मुक्त होते हैं। तीसरे पद्य में आचार्य का वर्णन आता है।  आचार्य ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, वीर्य का आचरण स्वयं करते हैं और दुसरों को भी प्रेरणा देते हैं। तीर्थंकर की वाणी को जन जन तक पहुचाते हैं, इसलिय उन्हें तीर्थंकर का प्रतिनिधि कहा जाता है।  चौथे पद्य में उपाध्याय का वर्णन आता है, जो 11 अंग और 12 उपांग के धारक होते हैं और अर्हत वाणी की वाचना करते हैं, वीतराग वाणी के अध्यापक होते हैं।  पांचवे पद में सर्व साधु का वर्णन आता है जो सर्व प्राणी के प्रति समभाव रखते हैं और पांच महाव्रत का पालन करते हैं। मुनिश्री द्वारा उद्बोधन मैं अर्हम शब्द, मंत्र धम्मो मंगल मुक्कीठ,  मंत्र चइत्ता भारहं वासं आदि मंत्रों की विस्तृत व्यख्या की।


मुनि श्री ने फरमाया की जैन संस्कार विधि क्यों बनाई गई इसका क्या अर्थ है तो संबंध में संक्षेप में कहा जाए तो गृहस्थ के जीवन में अनेक अवसर आते हैं जिन्हे एक आयोजन का रूप दिया जाता है, परिवार के सदस्य, समाजजन, रिश्तेदार आदि एक जगह एकत्रित होते है, तो आप  जब आयोजन करें तो उसमें जैनत्व की, अपनी संस्कृति की झलक दिखाई देना चाहिए, आयोजन में सादगी, शालिनता होने से हिंसा व आडंबर से बचा जा सकता है, वही अपव्यय पर भी अंकुश लगाया जा सकता है और अंधविश्वास से बचा जा सकता है। जब अपनी संस्कृति व  मान्यता के अनुरुप भाव रूप से मंत्रों का उच्चारण करेंगे तो सभी के सामूहिक उच्चारण से ओरा क्रिएट होता है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। गृहस्थों के लोक जीवन में व्यवहार दृष्टि में द्रव्य मंगल का भी अपना महत्व होता है। इस दृष्टि से गृहस्थ जैन संस्कार विधि के अंतर्गत कुछ पूजन सामग्री को काम में लेते हैं, लेकिन इस विधि में सचित्त सामग्री का प्रयोग नहीं किया जाता है। द्रव्य मंगल का महत्व लोक दृष्टि से है, आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं। इस संबंध में हमारी आस्था पुष्ट होनी चाहिए की द्रव्य मंगल से भाव मंगल का बहुत ज्यादा महत्व होता है। द्रव्य मंगल से ऊपर उठकर भाव मंगल की और आगे बढ़ने का हमारा लक्ष्य होना चाहिए।  लोक व्यवहार की दृष्टि से गृहस्थ बही-खातो की पूजा भी करते है, वैसा देखा जाए तो बही-खातों का तो क्या पूजन होगा। क्योंकि हम मानते हैं की बही-खाते पौद्गलिक होते हैं अजीव होते हैं। यहां हमें जैन संस्कार विधि के अंतर्गत इसके भावार्थ को समझना चाहिए कि  वास्तव में पूजन जैसा हम कुछ करते भी नहीं है। बही-खातों में हम जो कुछ लिखते हैं, उस पर गौर करना चाहिए। णमो समणस्स भगवओ महावीरस्स, नमस्कार महामंत्र लिखते है।स्वास्तिक में ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप का अंकन करते हैं। भगवान महावीर जैसा ज्ञान, गौतम गणधर जैसा ध्यान, भरत चक्रवर्ती जैसी अनासक्ति आदि संस्कृतिपरक वाक्य लिखे जाते है। इनसे हमें प्रेरणा मिलती है की हम जीवन में व्यापार आदि संसारिक कार्य करते हुए भी धर्म के और सद्गुण के संस्कारो को न भूले, नैतिकता व प्रमाणिकता को न भूले। धर्म के संस्कार हमारे जीवन के हर कार्य के साथ जुड़े रहना चाहिए। 


गृहस्थों के लिए पूजन विधि हमारी जैन संस्कृति अनुरुप बनाई गई है ताकी अनावश्यक हिंसा से बचा जा सके और गृहस्थों के अयोजनो में जैनत्व की झलक दिखाई दे। साधना उत्कृष्ट हो तो द्रव्य पूजा की अपेक्षा भाव पूजा की ओर बढ़ना ही इस विधि का प्रमुख उद्देश्य है।


मुनि श्री ने प्रेरणा प्रदान की, की आज इस कार्यशाला के माध्यम से जो समझा है, उसे अन्य गृहस्थों को भी बताए, ताकी आपका ज्ञान भी पक्का होगा आस्था भी पुष्ट होगी और अन्य गृहस्थ भी विधि के भाव को समझ सकेंगे।


कार्यशाला के अंत में तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष/संस्कारक रूपम पटवा,  मंत्री महेश भंडारी मुनिश्री के समक्ष प्रतीकात्मक रूप से मंगल भावना पत्रक को तेरापंथ सभा अध्यक्ष श्री विनोद जी भण्डारी को भेंट किया, ततपश्चात पूजन विधि व मंगल भावना पत्रक का समस्त उपस्थित समाजजन को वितरण किया। मुनि श्री की प्रेरणा से कुल 70 श्रावक-श्राविकाओं द्वारा जीवन भर के लिए आतिशबाजी व किसी भी प्रकार के पटाख़े जलाने का त्याग किया।कार्यक्रम का संचालन श्री फूलचंद जी कांसवा द्वारा किया गया, उक्त जानकरी तेयुप मीडिया प्रभारी पीयूष पटवा द्वारा दी गई।




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